• मुखपृष्ठ
  • विडियो
  • छात्र नोट्स
  • RSS
  • ट्विट्टर
  • फेसबुकवा पेज LIKE करें
  • मुखपृष्ठ
  • ब्लॉग
  • US
  • Business
    • Category
      • Category
      • Category
      • Category
      • Category
    • Category
    • Category
    • Category
  • Entertainment
  • Sports
  • Technology
  • Editor's picks
  • Top Stories
    • Category
    • Category
    • Category
    • Category
ठिकाना // मुखपृष्ठ »
पर्यावरण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का कहना है कि आर्कटिक सागर पर जमी बर्फ पिघलकर इस साल पिछले 30 वर्षो के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है. आर्कटिक दुनिया का तापमान नियंत्रण में रखने के लिए काफी महत्वपूर्ण है इसलिए वैज्ञानिकों में इसे लेकर चिंता है.

शोध में शामिल वैज्ञानिकों का कहना है कि ये मूलभूत बदलावों का एक अंग है.

आम तौर पर यहां की समुद्री बर्फ का पिघलना सितंबर तक जारी रहता है, इसलिए बर्फ के स्तर का और गिरना संभव है. (BBC से)

सर्दियों में आर्कटिक सागर बर्फ से ढक जाती है और तापमान पढ़ने के साथ पिघलते जाती है, लेकिन पिछले तीन दशकों में सैटेलाइट ने प्रति दशक गर्मियों के समयकाल में 13 फीसदी की कमी दर्ज की है.
अगर हर एक व्यक्ति अपने जिंदिगी में छोटे आदतें को बदलते हैं, तो बड़ी बड़ी पर्यावरणीय प्रभाव हो सकती है. दीपिका

राजीव गांधी ...
हजारों वर्षोंा से भारत ने आध्यात्मवाद की दिशा में अधिक विकास किया है, भौतिक दिशा में कम। पारम्परिक रुप से ही भारत का विश्वास रहा है कि मनुष्य और प्रकृति एक है और दोनों एक दूसरे के अभिन्न अंग है। इससे हमारी प्रकृति के बारे में जागरुकता आई है, हम प्रकृति के लिए महसूस कर सकते हैं।

साईट

भारत में प्रौद्योगिकी क्रांति आने से दोनों दिशाआें में विवाद खड़ा हो गया है। हमने अपनी प्रौद्योगिकी का विकास किया है। हमने अपने उद्योगों का विकास किया है और हम महसूस करते हैं कि हम अपनी पारम्परिक अध्यात्मवाद की गहराई और शक्ति से दिन पर दिन दूर होते जा रहे हैं। इससे हमारे सामाजिक ढांचे में कुछ समस्याएँ पैदा हो गई हैं। आज हम फिर से इन दोनों पहलुआें पर बराबरी के निर्माण करने की सोच रहे हैं।

हमारे इन प्रयत्नों में से सबसे महत्वपूर्ण है अपने पर्यावरण की सुरक्षा। भारत की विशेष समस्याएं है क्योंकि यहां की जनसंख्या बहुत अधिक है। पर्यावरण पर जनसंख्या से जो दबाव पड़ता है, अन्य देशों के मुकाबले भारत में सबसे अधिक है। विकासशील प्रक्रिया और गरीबी से यह और बढ़ जाता है। गरीबों के कारण जो कुछ उपलब्ध होता है, लोगों को उसी पर निर्भर होना पड़ता है। उनकी पहँुच भी कम साधनों तक होती है। इसलिए प्रकृति संरक्षण के लिए उच्च प्रौद्योगिकी के प्रयोग की क्षमता उनमें कम होती है।

हम स्कूल स्तर से ही पर्यावरण संरक्षण के बारे में जागरुकता लाने की कोशिश कर रहे हैं। पर्यावरण दूषित होने के भयंकर परिणामों से लोगों को परिचित करा रहे हैं। आखिरकार लोगों में जागरुकता ही पर्यावरण संरक्षण में सहायक हो सकती है।

किसी भी प्रकार के कानून पर्यावरण में सरंक्षण नहीं ला सकते, विशेष रुप से भारत जैसे विशाल देश में। इस प्रकार की गोष्ठियाँ जागरुकता लाने में सहायता करती हैं और मैं उम्मीद करता हँू कि हर स्तर पर इस तरह की गोष्ठियाँ आयोजित की जानी चाहिए। केवल दिल्ली में ही नहीं, भारत के अन्य हिस्सों में ताकि हम इस जागरुकता को पैदा कर सकें।

http://paryavaran-digest.blogspot.in/2007/01/blog-post_3772.html से

राजीव गांधी ...
हजारों वर्षोंा से भारत ने आध्यात्मवाद की दिशा में अधिक विकास किया है, भौतिक दिशा में कम। पारम्परिक रुप से ही भारत का विश्वास रहा है कि मनुष्य और प्रकृति एक है और दोनों एक दूसरे के अभिन्न अंग है। इससे हमारी प्रकृति के बारे में जागरुकता आई है, हम प्रकृति के लिए महसूस कर सकते हैं।

भारत में प्रौद्योगिकी क्रांति आने से दोनों दिशाआें में विवाद खड़ा हो गया है। हमने अपनी प्रौद्योगिकी का विकास किया है। हमने अपने उद्योगों का विकास किया है और हम महसूस करते हैं कि हम अपनी पारम्परिक अध्यात्मवाद की गहराई और शक्ति से दिन पर दिन दूर होते जा रहे हैं। इससे हमारे सामाजिक ढांचे में कुछ समस्याएँ पैदा हो गई हैं। आज हम फिर से इन दोनों पहलुआें पर बराबरी के निर्माण करने की सोच रहे हैं।



हमारे इन प्रयत्नों में से सबसे महत्वपूर्ण है अपने पर्यावरण की सुरक्षा। भारत की विशेष समस्याएं है क्योंकि यहां की जनसंख्या बहुत अधिक है। पर्यावरण पर जनसंख्या से जो दबाव पड़ता है, अन्य देशों के मुकाबले भारत में सबसे अधिक है। विकासशील प्रक्रिया और गरीबी से यह और बढ़ जाता है। गरीबों के कारण जो कुछ उपलब्ध होता है, लोगों को उसी पर निर्भर होना पड़ता है। उनकी पहँुच भी कम साधनों तक होती है। इसलिए प्रकृति संरक्षण के लिए उच्च प्रौद्योगिकी के प्रयोग की क्षमता उनमें कम होती है।

हम स्कूल स्तर से ही पर्यावरण संरक्षण के बारे में जागरुकता लाने की कोशिश कर रहे हैं। पर्यावरण दूषित होने के भयंकर परिणामों से लोगों को परिचित करा रहे हैं। आखिरकार लोगों में जागरुकता ही पर्यावरण संरक्षण में सहायक हो सकती है।

किसी भी प्रकार के कानून पर्यावरण में सरंक्षण नहीं ला सकते, विशेष रुप से भारत जैसे विशाल देश में। इस प्रकार की गोष्ठियाँ जागरुकता लाने में सहायता करती हैं और मैं उम्मीद करता हँू कि हर स्तर पर इस तरह की गोष्ठियाँ आयोजित की जानी चाहिए। केवल दिल्ली में ही नहीं, भारत के अन्य हिस्सों में ताकि हम इस जागरुकता को पैदा कर सकें।

http://paryavaran-digest.blogspot.in/2007/01/blog-post_3772.html से

राजीव गांधी ...
हजारों वर्षोंा से भारत ने आध्यात्मवाद की दिशा में अधिक विकास किया है, भौतिक दिशा में कम। पारम्परिक रुप से ही भारत का विश्वास रहा है कि मनुष्य और प्रकृति एक है और दोनों एक दूसरे के अभिन्न अंग है। इससे हमारी प्रकृति के बारे में जागरुकता आई है, हम प्रकृति के लिए महसूस कर सकते हैं।

कार्टून

भारत में प्रौद्योगिकी क्रांति आने से दोनों दिशाआें में विवाद खड़ा हो गया है। हमने अपनी प्रौद्योगिकी का विकास किया है। हमने अपने उद्योगों का विकास किया है और हम महसूस करते हैं कि हम अपनी पारम्परिक अध्यात्मवाद की गहराई और शक्ति से दिन पर दिन दूर होते जा रहे हैं। इससे हमारे सामाजिक ढांचे में कुछ समस्याएँ पैदा हो गई हैं। आज हम फिर से इन दोनों पहलुआें पर बराबरी के निर्माण करने की सोच रहे हैं।

हमारे इन प्रयत्नों में से सबसे महत्वपूर्ण है अपने पर्यावरण की सुरक्षा। भारत की विशेष समस्याएं है क्योंकि यहां की जनसंख्या बहुत अधिक है। पर्यावरण पर जनसंख्या से जो दबाव पड़ता है, अन्य देशों के मुकाबले भारत में सबसे अधिक है। विकासशील प्रक्रिया और गरीबी से यह और बढ़ जाता है। गरीबों के कारण जो कुछ उपलब्ध होता है, लोगों को उसी पर निर्भर होना पड़ता है। उनकी पहँुच भी कम साधनों तक होती है। इसलिए प्रकृति संरक्षण के लिए उच्च प्रौद्योगिकी के प्रयोग की क्षमता उनमें कम होती है।

हम स्कूल स्तर से ही पर्यावरण संरक्षण के बारे में जागरुकता लाने की कोशिश कर रहे हैं। पर्यावरण दूषित होने के भयंकर परिणामों से लोगों को परिचित करा रहे हैं। आखिरकार लोगों में जागरुकता ही पर्यावरण संरक्षण में सहायक हो सकती है।

किसी भी प्रकार के कानून पर्यावरण में सरंक्षण नहीं ला सकते, विशेष रुप से भारत जैसे विशाल देश में। इस प्रकार की गोष्ठियाँ जागरुकता लाने में सहायता करती हैं और मैं उम्मीद करता हँू कि हर स्तर पर इस तरह की गोष्ठियाँ आयोजित की जानी चाहिए। केवल दिल्ली में ही नहीं, भारत के अन्य हिस्सों में ताकि हम इस जागरुकता को पैदा कर सकें।

http://paryavaran-digest.blogspot.in/2007/01/blog-post_3772.html से

राजीव गांधी ...
हजारों वर्षोंा से भारत ने आध्यात्मवाद की दिशा में अधिक विकास किया है, भौतिक दिशा में कम। पारम्परिक रुप से ही भारत का विश्वास रहा है कि मनुष्य और प्रकृति एक है और दोनों एक दूसरे के अभिन्न अंग है। इससे हमारी प्रकृति के बारे में जागरुकता आई है, हम प्रकृति के लिए महसूस कर सकते हैं।

भारत में प्रौद्योगिकी क्रांति आने से दोनों दिशाआें में विवाद खड़ा हो गया है। हमने अपनी प्रौद्योगिकी का विकास किया है। हमने अपने उद्योगों का विकास किया है और हम महसूस करते हैं कि हम अपनी पारम्परिक अध्यात्मवाद की गहराई और शक्ति से दिन पर दिन दूर होते जा रहे हैं। इससे हमारे सामाजिक ढांचे में कुछ समस्याएँ पैदा हो गई हैं। आज हम फिर से इन दोनों पहलुआें पर बराबरी के निर्माण करने की सोच रहे हैं।

हमारे इन प्रयत्नों में से सबसे महत्वपूर्ण है अपने पर्यावरण की सुरक्षा। भारत की विशेष समस्याएं है क्योंकि यहां की जनसंख्या बहुत अधिक है। पर्यावरण पर जनसंख्या से जो दबाव पड़ता है, अन्य देशों के मुकाबले भारत में सबसे अधिक है। विकासशील प्रक्रिया और गरीबी से यह और बढ़ जाता है। गरीबों के कारण जो कुछ उपलब्ध होता है, लोगों को उसी पर निर्भर होना पड़ता है। उनकी पहँुच भी कम साधनों तक होती है। इसलिए प्रकृति संरक्षण के लिए उच्च प्रौद्योगिकी के प्रयोग की क्षमता उनमें कम होती है।

हम स्कूल स्तर से ही पर्यावरण संरक्षण के बारे में जागरुकता लाने की कोशिश कर रहे हैं। पर्यावरण दूषित होने के भयंकर परिणामों से लोगों को परिचित करा रहे हैं। आखिरकार लोगों में जागरुकता ही पर्यावरण संरक्षण में सहायक हो सकती है।

किसी भी प्रकार के कानून पर्यावरण में सरंक्षण नहीं ला सकते, विशेष रुप से भारत जैसे विशाल देश में। इस प्रकार की गोष्ठियाँ जागरुकता लाने में सहायता करती हैं और मैं उम्मीद करता हँू कि हर स्तर पर इस तरह की गोष्ठियाँ आयोजित की जानी चाहिए। केवल दिल्ली में ही नहीं, भारत के अन्य हिस्सों में ताकि हम इस जागरुकता को पैदा कर सकें।

http://paryavaran-digest.blogspot.in/2007/01/blog-post_3772.html से
मुख्यपृष्ठ

OMG // ओ मई ग्रीन!

    अगर हर एक व्यक्ति अपने जिंदिगी में छोटे आदतें को बदलते हैं, तो बड़ी बड़ी पर्यावरणीय प्रभाव हो सकती है. दीपिका

  • Recent Posts
  • Comments
Advertisement

Daily Video


    अधिक पर्यावरण वीडियो यहाँ हैं

Page

  • पहला पन्ना
  • छात्र नोट्स
  • विडियो

Photos on Flickr

लोकप्रिय पोस्ट

  • ग्रीन है खूबसूरत
    अगर हर एक व्यक्ति अपने जिंदिगी में छोटे आदतें को बदलते हैं, तो बड़ी बड़ी पर्यावरणीय प्रभाव हो सकती है. दीपिका
  • फैशन या फालतू // केट व सलू
    सलमान ने कैट को एसयूवी कार गिफ्ट कर दिया है. इतना पेट्रोल एक छोटी लड्की के लिए. फैशन या फालतू? 
  • Kyoto Protocol: क्योटो प्रोटोकॉल क्या है? (टेस्ट ३)
    क्योटो प्रोटोकॉल आवहवा परिवर्तन पर हुए संयुक्त राष्ट्र के प्रारूप सम्मलेन (United Nations Framework Convention on Climate Change/UNFCCC या F...
  • टेस्ट
    अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का कहना है कि आर्कटिक सागर पर जमी बर्फ पिघलकर इस साल पिछले 30 वर्षो के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है. आर्कटिक द...
  • टेस्ट २
    राजीव गांधी ... हजारों वर्षोंा से भारत ने आध्यात्मवाद की दिशा में अधिक विकास किया है, भौतिक दिशा में कम। पारम्परिक रुप से ही भारत का विश्वास...
  • बंदर की एक नई प्रजाति की पहचान
    "नई प्रजाति की पहचान डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कॉन्गो [अफ्रीका] में की गई है जहाँ इसे लेसुला कहा जाता है."  लेसुला - Cercopith...
  • ऑर्गैनिक भोजन सेहत की गांरटी नहीं
    ऑर्गैनिक या जैविक खाद्य पदार्थ खाने से सेहत पर असर नहीं पड़ता है. लेकिन इससे आपके भोजन में कीटनाशकों की मात्रा ज़रूर कम हो जाती है. ...
  • टेस्ट १
    राजीव गांधी ... हजारों वर्षोंा से भारत ने आध्यात्मवाद की दिशा में अधिक विकास किया है, भौतिक दिशा में कम। पारम्परिक रुप से ही भारत का विश्वास...
  • Biodiversity: जैव विविधता क्या है? (टेस्ट १ ग्रीन गुरु का)
    कुछ एक की जैव विविधता का  मूँगे की चट्टान  ( coral reef ). जैव विविधता, किसी दिये गये पारिस्थितिकी तंत्र, बायोम, या एक पूरे ग्रह में जीवन के...
  • टेस्ट ४
    राजीव गांधी ... हजारों वर्षोंा से भारत ने आध्यात्मवाद की दिशा में अधिक विकास किया है, भौतिक दिशा में कम। पारम्परिक रुप से ही भारत का विश्वास...
2010 Simplex Enews. All rights reserved.
Designed by SimplexDesign